SHIVPURI NEWS - पढिए माँ बलारी ने क्यों चुना बलारपुर को, लाखा बंजारा ने तोडा वादा, सुरवाया होती मॉ

Bhopal Samachar

काजल सिकरववार। शिवपुरी के माधव टाइगर रिजर्व के बीचो बीच घने जंगल में स्थित मॉ बालारी को देश का रिजर्व फॉरेस्ट का कानून भी अपनी बंदिशों मे नहीं पकड़ सका,घने जंगल और हिंसक जानवरों के बीच आस्था हमेशा भारी रहती है। इस बार भी हमेशा की तरह बालारी पर मेले का आयोजन किया जा रहा है। इस बार इस जंगल में टाइगर भी मौजूद है और टाईगर एमटी 1 और मादा टाइगर एम टी 2 और एमटी 3 ने भी अपने रहने का स्थान भी मॉ बालारी के पास का क्षेत्र चुना है,इस स्थिति में माधव टाइगर रिजर्व का प्रशासन अलर्ट मोड पर है।

आज से शुरू हो चुका है बलारी का मेला 
वैसे तो नवदुर्गा की सभी दिनो पर भक्तों बलारी के दर्शन करने पहुंचते है लेकिन सप्तमी अष्टमी को देवी विशेष रूप से पूजी जाती है। कल सप्तमी के दिन से माँ बलारी पर नेजे चढ़ने शुरू होते हैं। मॉ बालारी के प्राकट्य की एक अद्भुत कथा है,यह मंदिर लगभग 1 हजार साल पुराना है और अगर लाखा बंजारा एक गलती नही करता तो मॉ अपने गंतव्य पर पहुंच जाती तो आप और हम आज सुरवाया पर मॉ बलारी के दर्शन कर रहे होते।

बंजारा के कहानी सबसे अधिक है प्रचलित
वैसे तो मां बलारपुर के दरबार को लेकर कई कहानियां क्षेत्र में प्रचलित है। परंतु सबसे ज्यादा प्रचलित कहानी है कि मां बलारी के बाल रूप को बंजारा जाति के लाखा बंजारा भयावह जंगल में लेकर आया था। मंदिर को लेकर यह भी कथा प्रचलित है कि 1 हजार साल पहले राजा नल के राज्य से पूर्व मां के मंदिर की स्थापना की गई थी। इसकी पुष्टि पुरातत्व विभाग भी कर चुका है।

इस आशय की जानकारी मंदिर के मुख्य महंत प्रयाग भारती ने दी है। श्री भारती 1973 से मंदिर की सेवा में लगे हुए हैं। मंदिर से 2 किमी दूर मां का प्राकट्य स्थल भी मौजूद है, जहां आज भी पत्थरों के बीच में दरार है। बताया जाता है कि इसी स्थान से मां बलारी प्रकट हुई थीं। मंदिर में लगी मूर्तियां उस प्राचीनतम समय की पुष्टि करती हैं।

मंदिर के महंत प्रयाग भारती बताते हैं कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार उनके गुरू स्व: महंत शिव भारती जी ने 1952 में किया था। इससे पहले मंदिर पूरी तरह ध्वस्त हो गया था, लेकिन उनके गुरू शिव भारती जी के अथक प्रयासों से मंदिर आज वैभव की ओर अग्रसर है। यह मंदिर शहर से 30 किमी दूर भयावह जंगल में स्थित है, जहां मां की भव्य मूर्ति मंदिर में स्थित है।

एक दिन में तीन रूप बदलने की कहानी
कहावत यह भी प्रचलित है कि मां एक दिन में अपने तीन रूप बदलती हैं, लेकिन अभी तक किसी ने ऐसा होते नहीं देखा है। इसका खण्डन करते हुए श्री भारती ने कहा है कि मां उन्हीं लोगों को अपने तीन रूपों में दर्शन देती हैं जो मां की भक्ति में उनके रूपों के दर्शन की सत्यता जानने की नियत से वहां आता है।

मां को बाल रूप में लाने को लेकर एक कथा प्रचलित है जिसे महंत प्रयाग भारती ने वर्णन करते हुए बताया कि गुजरात से बंजारा समुदाय के लोग व्यापार करने के लिए अन्यत्र प्रदेशों में पहुंचने के लिए जंगल के रास्तों का प्रयोग करते थे और कई स्थानों पर वह अपना डेरा डालते थे। एक लाखा बंजारा नाम का व्यापारी अपने परिवार और जाति के लोगों के साथ गुजरात से उत्तर प्रदेश की ओर जाने के लिए बलारपुर ग्राम से कूच कर रहा था, बलारपुर से 2 किमी दूर झाला क्षेत्र में उसने अपना डेरा डाला।

जहां प्रतिदिन बंजारा समुदाय के बच्चे खेलते थे, वहीं एक बालिका भी उन बच्चों के साथ खेल में शामिल होती थी जिसे लाखा ने देख लिया और उसके बारे में जानकारी एकत्रित की, लेकिन उसका कोई भी पता उसे नहीं लग सका, वहीं वह बालिका भी वहां से गायब हो गइ। और एक दिन रात्रि में लाखा को उस बालिका ने दर्शन दिया और उससे कहा कि वह उसे बैलगाड़ी में बैठाकर सुरवाया ले चले और लाखा को बालिका ने एक शर्त दी कि वह तब तक पीछे मुड़कर नहीं देखेगा जब सुरवाया न आ जाये अगर उसने उस शर्त का उल्लंघन किया तो वह उसी स्थान पर उतर जायेगी।

लाखा  ने   तोड़ दिया अपना वादा मॉ ने बलारपुर को चुन लिया
बालिका की शर्त मंजूर कर वह उसे बैलगाड़ी से सुरवाया की ओर कूच कर गया लेकिन रास्ते में उसके मन में संशय हुआ कि बालिका ने ऐसा क्यों कहा, कहीं इसके पीछे कोई रहस्य तो नहीं और उसने शर्त का उल्लंघन करते हुए मुड़कर देख लिया तभी बालिका बैलगाड़ी से उतरकर अंतर्ध्यान हो गई।

जब वह बालिका अंतर्ध्यान हो गई जो लाखा बंजारा समझ गया कि यह कोई देवी है मेरी एक गलती के कारण देवी अंतर्ध्यान हो गई। लाखा एक चट्टान से पर अपना सर पटक-पटकर रोने लगा,बताया गया है मां का दिल पिघल गया और वह उसी चट्टान को फाड कर मूर्ति रूप में प्रकट हो गई।

लाखा बंजारा ने करवाया था मंदिर का निर्माण
बताया यह गया है कि जिस जगह मां प्रकट हुई उस जगह से लाखा ने मां की मूर्ति को ले जाकर एक मढिया बना दी और अब यह मंदिर बलारपुर के नाम से प्रसिद्ध है। पूर्व में यह मंदिर देखरेख के अभाव में ध्वस्त हो गया था क्योंकि उक्त जंगल में डकैतों का आतंक था जिस कारण कोई भी वहां नहीं जाता था। धीरे.धीरे उनके गुरू महंत शिव भारती जी ने उक्त मंदिर पर पहुंचकर वहां जीर्णोद्धार कराया और मंदिर पर पूजा अर्चना शुरू की गई।

एक समय रामबाबू गड़रिया का आतंक शिवपुरी सहित चंबल में व्यस्त था, लेकिन उनके गुरु शिव भारती जी अपने भक्ति भाव से मां की सेवा में लगे रहे। चैत्र नवरात्रि में यहां मेले की प्रथा शुरू हुई और धीरे-धीरे मंदिर की याति जिलेभर में फैल गई। लोगों ने डकैतों के डर को भी मन से निकालकर मां की भक्ति में लीन होकर दर्शनों के लिए यहां आने लगे। बीते चार साल पहले यह मंदिर फॉरेस्ट की जमीन में होने के चलते फॉरेस्ट ने इस मंदिर पर जाने से रोक लगा दी थी,लेकिन मंदिर से लोगो की आस्था जुडी होने के कारण कई बार आंदोलन हुए इस कारण रिजर्व फॉरेस्ट का कानून भी भक्तों का मॉ के दर्शन करने से नही रोक सका।