पोहरी। पोहरी जनपद की मडखेडा गाँव के निवासियों को पीने का पानी लाने के लिए जान की बाजी लगानी पड़ती है। इस गर्मी में गांव में निवास करने वाले आदिवासी समाज के लोगो का पूरा दिन पीने के पानी की व्यवस्था करने मे लग जाती है। इस गांव मे पीने के पानी का एक मात्र सहारा है उस तक पहुंचने के लिए एक पहाड को उतरना और चढना पडता है,वही ग्रामीणों का कहना है कि कुंए तक जल यात्रा करो नहीं तो पोहरी से 1 हजार रुपए मे निजी टैंकर मंगवाना पड़ता है।
एक मात्र कुआं ही साधन है,प्यास बुझाने का
मड़खेड़ा गांव से आधा किमी दूर स्थित इस कुएं पर पहाड़ उतरकर ही पहुंचा जा सकता है। जद्दोजहद के बाद बावजूद ग्रामीणों को इस कुएं से साफ पीने का पानी नहीं मिल पा रहा है। ब्लॉक से लेकर जिले तक के अधिकारियों को आदिवासियों की यह समस्या नजर नहीं आ रही है। दिखावे के लिए यहां अफसरों द्वारा कई दौरे तो किए गए, लेकिन समस्या का समाधान आज नहीं निकाला गया है।
विस्थापन करने की मांग
विस्थापित करने की मांग कर रहे आदिवासी जल संकट से जूझ रहे आदिवासी अब तो यहां तक कहने लगे हैं कि अगर शासन व प्रशासन हमारी समस्या का समाधान नहीं कर पा रहे तो हमें यहां से कहीं और विस्थापित कर दे। क्योंकि यहां उनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं है। मड़खेड़ा पंचायत के अंतर्गत ककरा गांव का हाल भी ऐसा ही है, यहां गांव वाले घाट उतरकर कछार (पहाड़ों के बीच जंगल) से पानी का बोझा ढो रहे हैं। इस पानी में आए दिन जंगली जानवर व अन्य मवेशियों के मृत शरीर तैरते मिल जाते हैं। इसके बावजूद इस तरह का पानी पीना उनकी मजबूरी हो गई है।
बच्चे लगा रहे है जान की बाजी
गांव में एक मात्र कुआं होने की वजह से पानी के लिए जद्दोजहद करना मजबूरी हो गई है। गांव के 8 से 10 साल के बच्चे भी अपने से ज्यादा वजन के बर्तन ले जाकर पानी भरते नजर आ रहे हैं। बच्चों को ऊबड़-खाबड़ रास्ते से दुर्गम पहाड़ के नीचे उतरना पड़ता है। चारों तरफ जंगल से घिरे गांव में रात के समय जंगली जानवरों का डर भी होता है। इस वजह से बच्चों को शाम होने से पहले पर्याप्त पानी भरना होता है।
अब यहां रहने का नहीं कर रहा मन
गांव में पानी की किल्लत होने के कारण अब यहां रहने का मन नहीं है। सरकार हमें यहां से कहीं और भेज दे। बिना पानी के हम कैसे रह पाएंगे। ककरा गांव में आबादी 1000 के आसपास है। पानी के लिए एक मात्र सहारा जंगल का कुआं है। जिसमें बंदर इत्यादि गिरते रहते है। हमे गंदा पानी पीना पड़ता है। पहाड़ उतरकर जाना और फिर वजन लेकर वापस आने में हमारे पैर जवाब दे जाते है।
सोनो आदिवासी, स्थानीय निवासी
चंदा करके 10 किमी दूर से टैंकर मंगा रहे आदिवासी
मड़खेड़ा पंचायत में ककरा एवं ऊमरी आदि गांव आते हैं। यहां गहराई पेयजल की समस्या के बावजूद पंचायत ने यहां के रहवासियों के लिए पानी के टैंकर उपलब्ध नहीं कराए। जिसके चलते गांव के आदिवासी 50-50 रुपए में चंदा करके 10 किमी दूर पोहरी से 1000 रुपए का निजी टैंकर मंगवाते हैं, ताकि उनकी प्यास बुझ सके।
पोहरी क्षेत्र को पानी के मामले में ड्राई क्षेत्र माना जाता है, इसलिए वहां पेयजल की किल्लत लोगों को हो रही है। इलाके में अगर ट्रांसपोर्टेशन की व्यवस्था हो सकती है तो बहुत बेहतर होगा। इस बारे में वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा करूंगा।
हिमांशु जैन, जिला पंचायत सीईओ, शिवपुरी